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૨૫.૦૬.૨૦૧૯

વડગામ તાલુકાના જલોત્રા ની મૂળ વતની બીનલ ની  હિંદી ભાષા માં લેખન શૈલી ખુબ જ ઉત્કૃષ્ટ છે…વતન જલોત્રા મુલાકાત સંદર્ભે લખેલ આ સુંદર લેખ વાંચો

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अरावली की गोद में मेरा गाँव हैं। गाँव के लोगों के लिए ये पहाड़ियाँ बहुत महत्वपूर्ण हैं। बचपन में शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने इस पर चढ़ने के लिए ज़िद नही की होगी और यौवन में शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने इस पर चढ़ने के एक भी मौक़े को गवाया होगा।
पुरानी पीढ़ी द्वारा शायद इसकी महत्वता बनाये रखने के लिए एक रीत बना दी गई थी कि गाँव के लोग अपने घर जन्मे पहले पुत्र की खुशी में इस पर चढ़कर ऊपर रखी प्रतिमा की पूजा करेंगे। इसी रीत के चलते, इन पर गर्मियों की छुट्टियों में वहाँ जाना हुआ।
रात के करीब तीन बजे हमने चढ़ाई शुरू की। अंधेरे में सिर्फ रास्ते पर ध्यान था पर जैसे ही सूरज अपनी किरणें घिराने लगा तो मानो उस पहाड़ी का नशा चढ़ रहा हो। ऊपर से देखने पर लग रहा था कि मानो ” गूगल मैप के सैटेलाइट व्यू ” को जीवंत देख रहे हैं। करीब 9 बजे हम लोग नीचे उतरे।
चूँकि कुछ लोग बाक़ी रह गए थे तो पापा ने उन्हें साथ लेकर आने का सोचा और बाकी लोगो को घर भेजा गया। अपने पापा कि बचपन की कहानियाँ और उस जगह से जुडी बातें जानने की लिए मैं उन्ही के साथ रह गई।
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नीचे आने पर चेहरे पर आश्चर्य था, रात के अंधेरे मे जो शुरुआत नहीं दिखी थी वो अब दूर दूर तक दिखाई दे रही थी। हैंडपंप से निकला ठंडा ठंडा मीठा पानी एक सुकून दे रहा था। मैदान की मिट्टी पर बिना जूते चलने का एक अलग ही मजा था।
थकान जब थोड़ी कम हुई और नजरें दौड़ने लगी तो एक पेड़ के नीचे कुछ बच्चों को खेलते देखा। वो वहाँ के स्थानिक आदिवासी लोगो के बच्चे थे। कुछ सोचने के बाद मैं वहाँ उनके पास जा खड़ी हुई। उन्होंने मुझे एक नजर देखा और वो फिर से अपने खेल में लग गए। वो कुछ पाँच छोटे छोटे पत्थरों से खेल रहे थे जिसे स्थानिय भाषा में “कुक्का” ( गुजराती शब्द) कहते हैं। मेरे पूछने पर कि क्या मैं वहाँ बैठ सकती हूँ, कुछ बोले बिना उन्होंने जगह दे दी।
मै कुछ पल उन्हें उनके खेल में मग्न खेलते हुए देखती रही फिर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए पूछा कि क्या तुम मुझे खिलाओगे? एक दूसरे की तरफ देख आँखों के इशारो से कुछ निश्चय करने के बाद एक लड़के ने अनुमति दी जिसका नाम विजय था।
मैंने खेलने की बहुत नाकाम कोशिशें की, वो हर बार मुझे देख रहे थे और मैं ख़ुद पर हँस रही थी। ये PUBG खेलने से भी ज्यादा मुश्किल लग रहा था।
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अपनी आदतों के अनुसार मैंने उनसे कई बातें की – वो अपनी आदिवासी बोली में कुछ बोल रहे थे जिसमें से मुझे कुछ शब्द ही समझ आ रहे थे। मैं उनसे बार बार एक ही बात पूछती और वो मुझे जितना हो सके उस हद तक समझाने की कोशिश कर रहे थे।
बातों ही बातों में उन्होंने बताया कि वो मिट्टी के घर में रहते हैं। माँ घर का और खेती का कुछ काम कर लेती हैं और पापा लकड़ियाँ काट कर गाँव में बेचते हैं। वहाँ बिजली नहीं आती पर वो दिन ढलते ही दीपक की रोशनी में परिवार के साथ सो जाते हैं। तालाब होने के कारण बारिश में बहुत पानी आ जाता हैं खेतों में, पर उन्हें पहाड़ियों से बहते छोटे छोटे झरने ज्यादा पसंद हैं।
उन्हें गर्मियों में नीम के पेड़ के नीचे सोने की आदत हैं और सर्दियों में वहाँ “कैंप फ़ायर” हर रात जलती है। इन सब के बावजूद भी वो गाँव की स्कूल में पैदल चल पढ़ने आते हैं । ये सब सुन कर मुझे अपनी गरीबी और उनकी अमीरी का अहसास होने लगा।
पापा ने जब तस्वीर लेनी चाही तो वो सब उनकी ओर देखने लगे।
उन्हें ये पता था कि इस मोबाइल से तस्वीर खींची जा सकती हैं पर फ़ोन स्क्रीन पर वो तस्वीर देखने की चाहत उनकी आँखों मे दिख रह थी। पापा से मैंने मोबाइल लिया तो वो बहुत खुश हो गए। अपनी तस्वीर को देख वो हँसने लगे।
पर उस तस्वीर के अलावा मेरे पास फ़ोन में बताने को कुछ नहीं था। उनके खेलों के सामने मुझे अपने मोबाइल में कुछ खास नहीं दिखा।
थोड़ी देर में हमें लेने के लिए गाड़ी आ गयी। पापा ने मुझे आवाज़ लगाई। पर मानो मेरा दिल वहीं थम सा गया हो, मैंने उन्हें अगली बार मिलने की बात कहीं और चलने लगी। कुछ कदम चलने के बाद वापस मुड़ी तो देखा कि वो बच्चे अपने खेल में फिर से उसी बचपने से लग गये हैं। दुःख हुआ कि यार ! इन्होंने एक दफा देखा भी नहीं। बुआ ने आवाज़ लगाई – जल्दी करो।
घर पहुंचने तक मैं ये ही सोच रही थी कि वो एक दफा मुड़े क्यो नहीं? पर फिर लगा कि ये ही उनकी जिंदगी हैं – सन्तुष्टता से परिपूर्ण । उनके लिए मेरे जैसे लोग साल में उस एक महीने हर बार आते हैं और कुछ समय रहकर चले जाते हैं। वो यदि हर किसी से आशा रखने लगेंगे तो जिंदगी कैसे जीयेंगे।
वो खुश हैं अपनी उस जिंदगी में, मिट्टी के घरों में, पेड़ो की छाव मैं, हैंडपंप के पानी में, दीपक की रोशनी में, अपने उन जीवंत खेलों में। वो यूँ ही मेरी तरह आश लगाए बैठे रहेंगे तो सिर्फ निराश होंगे। वो संतुष्ट हैं क्योंकि वो जिंदगी जीना नही चाहते हैं, वो जिंदगी जी रहे हैं प्रतिपल । वो आश में बैठे नहीं हैं वो यथार्थ के खेलों को खेल रहे हैं।

 

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૦૫.૦૬.૨૦૧૯

વડગામ તાલુકાની જલોત્રા ની બિનલ , કે જે નીર નૈન ઉપનામે હિન્દીમાં વર્તમાન પ્રવાહો ઉપર સુંદર લેખો લખે છે. તાજેતરમાં બીનલે વડગામ.કોમ ને સુરત ઘટના ઉપર હિન્દીમાં લખેલ પોતાનો વિચારપ્રેરક લેખ મોકલી આપ્યો છે જે અત્રે પ્રસ્તુત છે.

जिम्मेदार – कब बनेंगे हम ??? – बिनल “नीर नैन  ( जलोत्रा – वडगाम )

 

बचपन से ही ये पढ़ाया गया हैं कि जब से मानव प्रजाति का जन्म हुआ तब से ही जीवन के हर पहलू के साथ मनुष्य ने अपनी आवश्यकताओं के अनुसार कई कार्य किए। जिसे ‘प्लेटो’ ने एक सूत्र में बहुत ही खूबसूरती से बताया कि “Necessity is the mother of invention” अर्थात आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है।

आदिमानव को भूख लगी तो उन्होंने फल एवं माँस ढूंढा, शरीर के लिए पत्ते, रहने के लिए गुफाएँ व पेड़। ये सब उस सूत्र को पूर्णत साबित करते हैं। पर आधुनिकता के साथ जिस भाँति हम पत्तों से कपड़ो एवं गुफाओं से घरों की और पलायन कर चुके है उसी तरह उस रूढ़ हुए सूत्र से भी आगे बढ़ चुके हैं। आज के युग का सूत्र है-

“दुर्घटना ही आविष्कार की जननी हैं।”

24 मई के शाम को हुई सूरत की घटना, शायद इस सूत्र का पुख्ता सबूत हैं। एक ऐसी घटना जिसने सबको हिला दिया……प्रशासन को भी!!

शाम के रात में तब्दील होते तक तो मानो आग पूरे देश में फैल गई। नेताओं का “शोक” उनके ट्वीटर हैंडल्स पर और प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिखने लगा तो जनता का “रोष” व्हाट्सएप और समाचार चैनलों में दिखने लगा।

पर उस रात उन बच्चों के परिवार वालों के अलावा यदि कोई और भी जागा तो वो था कर्मचारी वर्ग। ऊपर बैठे पिट्ठू जो आग की गर्मी में कुछ समय पहले ही जागे थे वो रातों रात राज्य के कर्मचारी वर्ग को काम पर दौड़ाने लगे।

सुबह तक कई कोचिंग संस्थान, अवैधानिक रूप से बनी इमारतों और अन्य कई स्थानों पर सरकारी नोटिसों ने ताले लगवा दिए। सरकारी प्रणालियों, नीतियों या यूँ कहे कि हर प्रशासनिक विभाग के नियमों को दुरूस्त करने का काग़जी कार्य शुरू हो गए।

दूजे की आग में पापड़ सेकने वाली भारतीय मीडिया भी अपना अतिमहत्वपूर्ण योगदान देने लगी। अखबार एवं न्यूज़ चैनल्स सिर्फ इन खोखली खबरों से भरे थे।

इस आग में सिर्फ़ गुजरात ही नहीं जुलस रहा। परंतु पूरा देश इसके चपेट में हैं। हर जगह प्रशासन अब दौड़ रहा हैं।

हैरानी की बात तो यह हैं कि 8 करोड़ के लागत से जो Turn Table Ladder (TTL) सूरत प्रशासन द्वारा खरीदी गई और जो 1 महीने से मुंबई बन्दरगाह से हिल भी नहीं पा रही थी वो दुर्घटना के बाद अब सूरत आ चुकी हैं।

आखिर ऐसा कब तक होता रहेगा? कब तक हम इंतजार करेंगे दुर्घटनाओं के होने का। ताकि कुछ कदम उठा पाए। यदि ये TTL equipment वहाँ उस दिन मौजूद होता तो उन बच्चों को बेबस होकर कूदना न पड़ता।

हम सब जानते हैं कि एहतियात न बरतने से दुर्घटना हो सकती है। दुर्घटनाओं, अकस्मात, प्राकृतिक आपदाओं के होना मनुष्य के बस मे नहीं। अकस्मात अचानक से ही होते हैं। पर क्या यह हमारा कर्तव्य नहीं है कि हम ये सुनिश्चित करें कि हमारी या किसी और की जान जोखिम में न हों। सूरत की उस इमारत में रोज कई सैकड़ों लोग जाते होंगे। पर क्या किसी के मन में भी प्रश्न उठा होगा।

 

खैर, क्या कर सकते हैं?

हमें आदत जो हैं – बातों को नजरअंदाज करने की।

हमें आदत है – हेलमेट न पहनने की। फिर यदि कोई दुर्घटना हो जाए तो हम दूजों को कोसने लगते हैं।

हमें आदत है – रिश्वत देने की। ताकि हमारी सुगमता बनी रहे और फिर यदि कोई घोटाला हो जाए तो हम आरोपों और आंदोलन का खेल खेलने लगते हैं।

हमे आदत है – लापरवाही की। फिर यदि कोई दुर्घटना हो तो हम देश को 24 मई के सूरत बना दें।

पर आखिर कब तक हम हमारी नजरअंदाजगी को दूसरों पर आरोप डालने का कारण बनाएंगे।

कभी तो अपने बच्चों को रोकिये कॉलेज बिना हेलमेट पहने जाते वक़्त। कभी तो अपने पिता को रोकिये रिश्वत देते वक़्त। कभी तो स्वयं को रोकिये लापरवाही करते वक़्त।

नहीं तो हम सब सिमट जाएंगे – दुर्घटनाओं में और उनसे बचने की आवश्यकताओं के आविष्कार में।

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તા. ૦૪.૧૨.૨૦૧૮

પોલીસ કોન્સ્ટેબલની પરીક્ષા અને વોટ્સએપની વાતો

મિત્રો નમસ્કાર,

(આ લેખ સંપૂર્ણ વાંચવા ભલામણ છે)

નવ લાખ વિદ્યાર્થીઓ નવ હજાર પોલીસની જગ્યાઓ માટે પરીક્ષા આપવાના હતા, માની જ લો કે એ પરીક્ષા આપી દીધી કે હવે આપશે તો પણ એની

સંભાવના (Probability) શુ હોઈ શકે ?

9000 પોલીસ બનશે, અને બાકીના 8,91,000 નાપાસ થશે / નિષ્ફળતા મળશે

એટલે કે 99 % વિદ્યાર્થીઓ નિષ્ફળ અને 1 % વિદ્યાર્થીઓ સફળ થશે.

હવે રસપ્રદ વાત તો એ છે કે….

આ 1 % વિદ્યાર્થીઓને ખબર છે કે હું મારી મહેનતથી જ પાસ થયો છું, પરંતુ 99 % અસફળ હશે એ વિદ્યાર્થીઓ અને એમના વાલી, પરીવાર એમજ કહેશે કે મારો દીકરો 0.10 માટે, 0.50 માટે રહી ગયો, ત્યાં સુધી બરાબર પણ હવે મોટાભાગના નિષ્ફળ વિદ્યાર્થીઓ, એમના પરિવારજનો એમ કહેશે કે એતો પાસ થનારા રૂ. આપીને પાસ થઈ ગયા, અમે અથવા  અમારા બાળકો રહી ગયા ને માર્કેટમાં/ સોશિયલ મીડિયામાં // ગામના ચોકમાં વાતો આજ વધારે ચાલશે કે અમે રહી ગયા/અમારા બાળકો રહી ગયા  અને પાસ થનારા પર આરોપ લાગશે

કેમ ??

કારણ કે  જે વિદ્યાર્થીઓ સફળ છે એ માત્ર એક ટકા જ છે એટલે એ મહેનત કરીને પાસ થયા છે એવી સારી વાતો//પોઝિટિવ ઉર્જા માત્ર એક ટકા જ રહેશે, જ્યારે 99 ટકા નેગેટિવ ઉર્જા ( એક ટકા સફળ વિદ્યાર્થીઓ પર આરોપ મુકવાની વાતો) માર્કેટમાં/ સોશિયલ મીડિયામાં // ગામના ચોકમાં વધુ જોર શોરથી ફરશે એટલે આપણી આજુબાજુ પણ એ જ નેગેટિવ ઉર્જાની વાતો ચોક્કસ આવશે અને એ આપણે વિચાર કર્યા વગર સ્વીકારી લઈએ છીએ અને એ વાતો જ તૈયારી કરતા વિદ્યાર્થીઓ// આપણા પરિવારમાં હંમેશા અસર કરે છે

એટલે જે વિદ્યાર્થીઓ// જે વાલીઓએ પોતાના બાળકોને સફળતાનાં માર્ગે લઈ જવા છે એમને પોઝિટિવ ઉર્જામાં જ રહેવું, જે સફળ વિદ્યાર્થીઓ છે એમની વાતો સાંભળવી, નહીં કે નિષ્ફળ લોકોની….

નીચે કેટલીક પોઝિટિવ ઉર્જા ઉત્પન્ન થાય એ માટેના થોડા ઉદાહરણ ( આધાર પુરાવા સાથે) રજૂ કરું છું.

આ સિદ્ધિઓ વર્ષ 2018ના વર્ષની જ છે

  1. 2018ના વર્ષમાં સમગ્ર ભારતમાં સૌથી યુવા વયે એક ગરીબ ઘરનો છોકરો *IPS* બન્યો,

નામ છે, *સફીન હસન, વતન કાણોદર* ( કેવી પરિસ્થિતિ હતી એ જોવી હોય તો આ LINK પર જોઈ શકશો ( https://youtu.be/I-JUd34cviw )

  1. કુરિયર તરીકે ફરજ બજાવતો એક છોકરો *શ્રી મૌલિક શ્રીમાળી* આસિસ્ટન્ટ કમિશ્નર બન્યો, જુઓ ( https://youtu.be/SOLM21K6UjQ )
  1. સૌરાષ્ટ્રનો વતની અને ધીરુભાઈ અંબાણીના ગામનો એક છોકરો *શ્રી રવિ ચાવડા* ગાંધીનગરમાં જ સેક્ટર 21માં દૂધ વેચતો અને મહેનત કરી સિનિયર ક્લાર્ક બન્યો અને તાજેતરમાં 15 દિવસ પહેલા જ P. I. પણ બન્યો

https://youtu.be/E5LRDjMjRiA  )

(આ લિંક પર ક્લીક કરી તમે એમના જીવન વિશેના વીડિયો રૂપે વાસ્તવિકતા જોઈ શકશો  )

આ તો માત્ર ઉદાહરણ છે આવા હજારો વિદ્યાર્થીઓ તમારી આસપાસ પણ હશે કે જેમને એક નહીં પણ 20-20 પરીક્ષાઓ એક પણ રૂ.આપ્યા વગર મહેનત કરી સફળતા પ્રાપ્ત કરી હશે તો બસ હવે કરવું શું ??

તાજેતરની ઘટનાઓમાંથી ઉદ્દભવતી અફવાઓ પર ધ્યાન આપવાના બદલે આપ અથવા આપણા બાળકોને આવા પોઝિટિવ ઉર્જાના વાતાવરણમાં જ રહેવા પ્રયાસ કરવો.

( નોંધ :: ખોટું કરનારા હશે તો પણ એ 0.0…. % માં જ હશે એટલે ચિંતા કરવી નહીં અને એ કાનૂનનો વિષય છે, આપણો નહીં, આપણે તો તૈયારીની મસ્તી માં ડૂબી જવું )

સફળતા આજે નહી તો કાલે ચોક્કસ મળશે જ

*…………………………..કોશિશ કરને વાલો કી કભી હાર નહીં હોતી*

લિ..  ડૉ. દિનેશ……       (જ્ઞાતિ… *ભારતીય* જ સમજવી )

(નાવિસણા -વડગામ)

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Binal -15.08.2018

15 अगस्त…

सुबह से ही शहर आज़ाद हो रहा था । उत्सव मना कर मैं भी वापस लौट रही थी। आज़ादी के ख़याल और भारत मन पर छाया हुआ था ।

रोज़ गुजरती हूँ उस रास्ते से पर फिर भी वहाँ नज़र कम जाती थी। आज अचानक ध्यान से देखा तो वहाँ से दो आदमी लौट रहे थे औऱ पीछे एक सूचना थी। मैंने दीवार पर लिखी वो सूचना पड़ी। जो सजावट में कहीं छुप सी गई थी । सूचना पढ़, मैंने तस्वीर खींची और चलने लगी।

पर आज़ाद का दिन था , भारत का दिन था, कुछ तो खास था। पास ही एक दुकान थी जहाँ “देशभक्ति” के गाने बज रहे थे। और गाना बज रहा था … IT HAPPENS ONLY IN INDIA….

संयोग था और शायद व्यंग्य भी ।